Saturday, 21 May 2016

राजस्थान में प्यास से तड़पकर मर गई सैकड़ो गायें,”गाय माता” चिल्लाने वाली बीजेपी को होश नहीं


केद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के मुख्य एंजेंडे में शायद गौरक्षा शामिल न हो लेकिन उससे जुड़े तमाम संगठन हमेशा गौरक्षा का राग अलापते रहते है। गाय को राष्ट्रमाता घोषित कराने की मुहिम हमेशा चलती रहती है। यह मुहिम जन्तर-मन्तर से लेकर रामलीला और शहरों की दिवारों पर संदेशनुमा चस्पे दिख ही जाते है। क्योंकि हिंदू धर्म में गाय को आस्था से जोड़कर देखा गया है। मान्यताएं है कि गाय के पूरे शरीर मेंं देवताओं का वास होता है इसलिए भगवान कृष्ण को गोपाल कृष्ण गोविंद यानि की गाय के पालनहार कहते है !


इसलिए शायद वोटबैंक की राजनीति चमकाने के लिए भारतीय जनता पार्टी गाहे-बगाहे गाय के मुद्धे को राजनीति में इस्तेमाल करती है। पर कुछ दिनों से राजस्थान के सवाई माधौपुर जिलें में पानी की कमी के चलते बेजुबान पशु प्यासें दम तोड़ रहें हैं। यहाँ गायों के मरने की संख्या सैकड़ो के पार पहुंच चुकी है। पर फिर भी केंद्र में सत्तासीन नरेंद्र मोदी की सरकार जिनकी सरकार में शामिल एकतरफा पूरा प्रदेश जीत कर आए 25 माननीय सांसद को होश नहीं है। इतना ही नहीं प्रदेश में भी बीजेपी की वसुंधरा राजे पूर्ण बहुमत से सरकार में बैठी है। पर प्यासे बेजुबान दम तोड़ते पशुओं की सुध किसी को नहीं है। कल कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने इस भयावह और दिल दहला देने वाले मंजर पर सुध ली औऱ जाकर आफन-फानन में गायों के लिए पानी का इंतजाम किया।

गायों पर राजनीति करने वाले संगठन इस दर्दनीय घटना से बेखबर है। क्योंकि शायद उन्हें सिर्फ गाय औऱ आस्था दोनों पर राजनीति करना बखूबी आता है। पर इन बेजुबान पशुओं को तड़पते देख इऩकी न आँखे पसीजती है और न ही दिल।


साभार- boltahindustan.com

राजस्थान में प्यास से तड़पकर मर गई सैकड़ो गायें,”गाय माता” चिल्लाने वाली बीजेपी को होश नहीं


केद्र में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के मुख्य एंजेंडे में शायद गौरक्षा शामिल न हो लेकिन उससे जुड़े तमाम संगठन हमेशा गौरक्षा का राग अलापते रहते है। गाय को राष्ट्रमाता घोषित कराने की मुहिम हमेशा चलती रहती है। यह मुहिम जन्तर-मन्तर से लेकर रामलीला और शहरों की दिवारों पर संदेशनुमा चस्पे दिख ही जाते है। क्योंकि हिंदू धर्म में गाय को आस्था से जोड़कर देखा गया है। मान्यताएं है कि गाय के पूरे शरीर मेंं देवताओं का वास होता है इसलिए भगवान कृष्ण को गोपाल कृष्ण गोविंद यानि की गाय के पालनहार कहते है !




इसलिए शायद वोटबैंक की राजनीति चमकाने के लिए भारतीय जनता पार्टी गाहे-बगाहे गाय के मुद्धे को राजनीति में इस्तेमाल करती है। पर कुछ दिनों से राजस्थान के सवाई माधौपुर जिलें में पानी की कमी के चलते बेजुबान पशु प्यासें दम तोड़ रहें हैं। यहाँ गायों के मरने की संख्या सैकड़ो के पार पहुंच चुकी है। पर फिर भी केंद्र में सत्तासीन नरेंद्र मोदी की सरकार जिनकी सरकार में शामिल एकतरफा पूरा प्रदेश जीत कर आए 25 माननीय सांसद को होश नहीं है। इतना ही नहीं प्रदेश में भी बीजेपी की वसुंधरा राजे पूर्ण बहुमत से सरकार में बैठी है। पर प्यासे बेजुबान दम तोड़ते पशुओं की सुध किसी को नहीं है। कल कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने इस भयावह और दिल दहला देने वाले मंजर पर सुध ली औऱ जाकर आफन-फानन में गायों के लिए पानी का इंतजाम किया ।



गायों पर राजनीति करने वाले संगठन इस दर्दनीय घटना से बेखबर है। क्योंकि शायद उन्हें सिर्फ गाय औऱ आस्था दोनों पर राजनीति करना बखूबी आता है। पर इन बेजुबान पशुओं को तड़पते देख इऩकी न आँखे पसीजती है और न ही दिल।


साभार- boltahindustan.com

Tuesday, 10 May 2016

ये कैसे 'आतंकवादी' थे जो चार दिनों में छूट गए?

कुछ दिनों पहले दिल्ली में जैश-ए-मोहम्मद से संबंध रखने के आरोप में 13 लोगों को हिरासत में लिया गया था। बताया गया था कि ये लोग दिल्ली में भी पठानकोट जैसा हमला करना चाहते थे। उनके पास से विस्फोटक और टाइमर आदि भी पाए गए थे। सारे टीवी चैनलों ने इसे चलाया, अखबारों ने हेडिंग बनाई। वेबसाइटों पर यह खबर चली। पाठकों ने कॉमेंट लिखे। नीचे देखें नेट पर चली कुछ हेडलाइन्स।





आप देखेंगेइंडिया टुडे और पत्रिका ने तो साफ कह दिया कि ये सभी आतंकवादी हैं जबकि नवभारत टाइम्स और NDTV इंडिया ने पत्रकारिक ज़िम्मेदारी का ख़्याल रखते हुए उनको केवल संदिग्ध आतंकवादी बताया है। वैसे NDTV इंडिया और नवभारत टाइम्स की ख़बरों में भी फ़र्क़ है। NDTV इंडिया ने जहां केवल 3 को संदिग्ध आतंकी लिखा है, वहीं नवभारत टाइम्स ने सभी 13 को संदिग्ध आतंकी बताया है।
हिरासत में लिए गए लड़कों के परिवारवाले कहते रहे कि ये बच्चे आतंकवादी नहीं हैं। लेकिन ऐसा तो सभी कहते हैं। कौन इन पर यक़ीन करता है? मीडिया भी क्यों करे?
आरोपियों से पूछताछ हुई। तीन दिन बाद 4 लोगों को छोड़ दिया गया और कल-परसों बाक़ी 6 को भी छोड़ दिया गया। देखें नीचे इन ख़बरों के स्क्रीनशॉट।


अब आप सोच रहे होंगे, ‘जैश के इन आतंकवादियोंको जैसा कि इंडिया टुडे और पत्रिका ने पहले ही दिन बताया था, चार-पांच दिनों बाद क्यों छोड़ दिया गया। क्योंकि उनके खिलाफ़ जैश से जुड़े होने या किसी साज़िश में शामिल होने सबूत नहीं मिले। नहीं मिले तो पहले उनको आतंकवादी क्यों बताया थाहै कोई जवाब?

नहीं है। तो अब क्या करें? करना क्या, जाओ घर, अब हो गया मामला ख़त्म।

घर जाओ! क्यों घर जाओ? क्यों कोई उस पुलिस और उस मीडिया से सवाल नहीं करे जिसने पहले दिन इन सबको आतंकवादी ठहरा दिया था? मैं यहां स्पष्ट कर दूं कि जब मैं मीडिया की बात करता हूं तो नवभारत टाइम्स को भी कठघरे में खड़ा करता हूं ख़ासकर वेबसाइट को। देखें, हमारी साइट पर  छपी यह ख़बर जो हमने हमारे सहयोगी समाचार पत्र सांध्य टाइम्स से ली थी। हेडिंग में भले ही संदिग्ध शब्द का इस्तेमाल किया गया हो मगर देखिए, इसकी पहली लाइन क्या कहती है!
पहली लाइन है –  राजधानी को दहलाने की साज़िश रच रहे 13 लोग पुलिस के हत्थे चढ़े हैं। यानी न कोर्ट, न कचहरी, न वक़ील, न दलील, रिपोर्टर साहब ने कर दिया फ़ैसला –  वे 13 लोग दिल्ली को दहलाने की साज़िश रच रहे थे। आगे लिखा है – ये लोग विस्फोटक जमा करके बम बना रहे थेइनके पास से बम बनाने में इस्तेमाल होनेवाली बैटरी, टाइमर आदि मिले हैं।
अब जब 13 लोगों के पास बम बनाने का सामान, टाइमर, बैटरी आदि मिले तो साफ़ है कि वे सारे के सारे आतंकवादी हैं। ठीक?

तो फिर 13 में से 10 आख़िर रिहा कैसे हो गए? जब इतना सारा सबूत था तो अब पुलिस क्यों कह रही है कि एक भी सबूत नहीं मिला इनके ख़िलाफ़? क्या वे सारे सबूत फ़र्ज़ी थे? क्या वह झूठ था जो पुलिस ने बताया था? क्या वह झूठ था जो रिपोर्टर साहब ने लिखा था?
सच्चाई यह है कि विस्फोटक रखने के आरोप में केवल तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है और बाक़ी का इससे कोई संबंध नहीं था। लेकिन  मीडिया के बड़े हिस्से ने ऐलान कर दिया जैश से संबंध रखनेवाले 13 आतंकी ग़िरफ़्तार। कुछ ने संदिग्ध लगाया, कुछ ने नहीं। संदिग्ध लगाया तो वह भी ऐसे मानो एक रस्म निभा रहे हों। संदेश यही है कि ग़िरफ़्तार होनेवाला हर मुसलमान आतंकवादी हैं जब तक कि वह निर्दोष न साबित हो जाएं। Guilty unless proved innocent!

अभी कुछ ही दिनों पहले मालेगांव बम धमाके में गिरफ़्तार 9 लोगों को कोर्ट ने रिहा कर दिया। ये सभी मुस्लिम थे और उनको 2006 में ATS ने ग़िरफ्‍तार किया था। मामला लंबा चला। वे जेल में सड़ते रहे। कोई सबूत नहीं मिला तो NIA ने दो साल पहले  कह दिया कि उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं है। और अब उनको बरी और रिहा कर दिया गया है। उन लोगों का दोष इतना था कि वे मुसलमान थे और शायद प्रतिबंधित संगठन सिमी से जुड़े हुए थे। यही काफ़ी था उनको मालेगांव धमाके से जोड़ने के लिए जिसके बारे में बाद में पता चला कि इस धमाके के पीछे भगवा संगठनों का हाथ है। स्वामी असीमानंद का क़बूलनामा NIA के पास है हालांकि असीमानंद अब उस क़बूलनामे को वापस ले चुके हैं।

अब हाल यह हो गया है कि जब पुलिस किसी को ग़िरफ़्तार करके उसे आतंकवादी बताती है और मीडिया आतंकवादी-आतंकवादीचिल्लाता है तो विश्वास कम और शक ज़्यादा होता है। इसके लिए दोषी जितनी पुलिस है, उससे ज़्यादा दोषी मीडिया है जिसने मान लिया है कि पुलिस जो कहेगी, उसको दस गुना बढ़ाकर लोगों को बताना है क्योंकि ये ख़बरें अच्छी चलती हैं। फिर जब चार दिन बाद पुलिस या कई साल बाद अदालत इन मीडिया-घोषित आतंकवादियों को रिहा करती है तो वह उस ख़बर को कोने में डाल देता है या गोल ही कर देता है।  कोई माई का लाल पत्रकार नहीं है जो  पलटकर पुलिस और मीडिया से पूछे कि भैये, पहले कैसे कह रहे थे कि यह आतंकवादी हैजो पूछता है वह  देशद्रोही और पाकिस्तानी एजंट ठहरा दिया जाता है जैसे कि मुझे ठहराया जाएगा यह पोस्ट लिखने के लिए।

आपमें से कई को मेरी यह पोस्ट हज़म नहीं हो रही होगी। ऐसे पाठकों से केवल एक सवाल पूछता हूं- कल यदि पुलिस आपको किसी महिला से रेप करने या आपके घर की किसी महिला को धंधा करने के आरोप में हिरासत में ले ले, और यही मीडिया वाले आपको रेपिस्ट और आपके परिवार की उस भद्र महिला को धंधेवाली बताते हुए  नाम और फ़ोटो अख़बार में छाप दें तो आपको कैसा लगेगा? कैसा लगेगा? माफ़ कर पाएंगे कभी उस पुलिसवाले कोऔर उस मीडिया कोऔर उस समाज को जो इस ख़बर को चटखारे ले-लेकर शेयर करेगा?

आतंकवादी का ठप्पा लगना उतना ही अपमानजनक  और तक़लीफ़देह है जितना रेपिस्ट या वेश्या कहलाया जाना। सोचिए। महसूस कीजिए उनकी पीड़ा को जिनपर यह आरोप लगा है। उनके परिवारवालों के बारे में सोचिए एक बार।













Sunday, 8 May 2016

मदर्स डे : भारत माता के गरीब बच्चों को ही मौत की सजा क्यों?

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली द्वारा जारी मृत्युदंड प्रोजेक्ट की रिपोर्ट के अनुसार ज्यादातर मामलों में गरीब और वंचित वर्ग के लोगों को ही फांसी की सजा होती है। इस मौके पर सुप्रीम कोर्ट के जज मदन बी लोकुर ने कहा कि भारत की आपराधिक न्यायिक व्यवस्था ध्वस्त हो गई है जिसे तत्काल सुधारने की जरूरत है।

गरीबों को सजा और अमीरों के लिए मजा
इटली की अदालत ने नवीनतम फैसले में मजबूरी में चोरी करने वाले गरीब आदमी को सजा देने से इंकार कर दिया। दूसरी ओर भारत में छुट-पुट चोरी और अपराध के आरोप में लाखों बेगुनाह जेल में सड़ रहे हैं जिनमें अधिकांश अशिक्षित और गरीब हैं। ऐसे मामलों में पुलिस तथा अदालतें कानून की मनमर्जी व्याख्या कर कठोरतम दंड देती हैं जिसके खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने का हौसला गरीबों के पास होता ही नहीं। दूसरी ओर 9 हजार करोड़ के कर्ज को डकार कर विजय माल्या यूरोप में मजे लेते हुए पूरी न्यायिक व्यवस्था को ठेंगा दिखा रहे हैं।

अमीरों को सुरक्षा पर गरीबों को कानूनी सहायता भी नहीं
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत देश के हर नागरिक को सुरक्षा का अधिकार है। भारत की सबसे शक्तिशाली महिला नीता अंबानी को मोदी सरकार द्वारा वाई-कैटेगरी की सुरक्षा व्यवस्था सुरक्षा मुहैया कराई गई है, जिसके तहत 20 सुरक्षा अधिकारियों का काफिला उनके साथ रहेगा। इसी तरह से कथित अपराधियों को भी कठोर सजा या मृत्यू दंड देने से पहले क्या श्रेष्ठतम कानूनी सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए? एनएलयू की रिपोर्ट के अनुसार फांसी की सजा दिए गए 90 फीसदी अपराधियों को शुरुआती दौर में वकील की मदद ही नहीं मिली! इस वजह से पुलिस द्वारा दर्ज केस ही कई बेगुनाह लोगों की फांसी और माताओं की त्रासदी बन गए।



फांसी की सजा पर है कानूनी विवाद
संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश सदस्य देशों ने  महासभा द्वारा मृत्युदंड समाप्ति के प्रस्ताव का समर्थन किया लेकिन भारत में इस पर विवाद है। पिछले हफ्ते राज्यसभा में फांसी की सजा को गैर-जरूरी और अनुचित करार देते हुए सरकार से इसे समाप्त करने कीं मांग की गई पर डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने उसका जोरदार विरोध किया। पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम एवं विधि आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति ए पी शाह ने भी मृत्युदंड पर पुनर्विचार किए जाने की आवश्यकता बतायी थी। सुप्रीम कोर्ट भी कई मामलों में यह स्वीकार कर चुका है कि फांसी की सजा देने में कई बार त्रुटियां हुई हैं जिससे लोगों को  सही न्याय नहीं मिल सका है।  

संविधान तो भारत माता के सभी लाड़लों के लिए है
सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में आर्थिक अपराधियों और सफेदपोश नेताओं को देश का दुश्मन बताया है। ऐसे गुनाहगारों के लिए कड़े दंड की बजाय उनके ऊपर राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा वीआईपी सुरक्षा के नाम पर हजारों करोड़ खर्च किए जा रहे हैं। अगस्ता वेस्टलेंड मामले में इतनी बहस और सबूतों के बावजूद कोई गिरफ्तारी न होने से आम जनता में यही धारणा बनती है कि कानून सिर्फ गरीबों के लिए है। गरीबी, अशिक्षा और अपराध का एक भयानक दुश्चक्र है जिसे अदालतें समझने में विफल रहीं हैं, जिसकी स्वीकरोक्ति सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस लोकुर ने की है।

क्या भारत माता की शासन व्यवस्था, मदर्स डे पर संविधान के प्रभावी पालन का संकल्प लेगी, जिसमें आम जनता को भी बराबरी और न्याय मिल सके? जेलों में सड़ रहे लाखों बेगुनाह कैदियों की रिहाई करके क्या सरकार और अदालतें अभागी माताओं को मदर्स डे का गिफ्ट दे पाएंगी?

मुसलमानों को साथ लेकर सबके लिए आंदोलन, मुसलमानों के लिए सिर्फ बोलबच्चन

हम कन्हैया के साथ थे, हम रोहित वेमुला के साथ थे, हम अन्ना के साथ थे, हम सोनी सुरी के साथ थे, हम जेएनयु के साथ थे और हम रविश के साथ थे.आज आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से हमारी गिरफ्तारी हो रही है. आज हम अकेले है. हमारे साथ न कोई कन्हैया है, न कोई वेमुला, न कोई सुरी, न कोई जेएनयु और नहीं कोई रविश है. हम कल भी अकेले थे, आज भी अकेले है और शायद कल भी अकेले ही रहेंगे. हमने कल भी मजलुमों का साथ दिया था, आज भी दे रहे है और कल भी देते रहेंगे.

यह बात बलकुल सही है. यह सच सुनकर कई लोग आगबबुला भी हुए होंगे और कई स्वघोषित मुस्लिम हितचिंतको के पिछवाड़े भी जल गए होंगे. जो लोग अपने आप को फेमस करने के लिए असाम जाकर वहांके आपदाग्रस्त लोगो को वडापाँव बांटकर आये ऐसे लोग भी बेगुनाह मुसलमानों की गिरफ्तारियां और 15-20 साल बाद रिहाई के मुद्दे पर अपनी जुबाने locker  में रखे हुए है. जब कोई सोशल मीडिया पर या आमना सामना सवाल पूछता है तो कहते है हमारे हाथ में सत्ता दो हम करेंगे.  साले सब धोखीबाज है. 

रोहित वेमुला के नेशनल लेवल पर आंदोलन किया जाता है जिसमे मुसलमानों का भरपूर साथ सहयोग होता है.  कन्हेया के लिए आंदोलन किया जाता है उसके साथ भी मुसलमानों का सहयोग होता है. सोनी सोरी के लिए आंदोलन किया जाता है उसमे भी मुसलमान आगे होता है. आरक्षण के लिए आंदोलन किया जाता है, मुसलमानों को तो मिलता नहीं लेकिन दूसरो को दिलाने के लिए मुसलमानों का साथ और असहयोग होता है. जब मुसलमानों की बात आती है तो अकेला मुसलमान ही लढता है. जेएनयू के लिए आंदोलन सभी मुसलमानों का साथ सहयोग.  हर आंदोलन में, हर कार्य में मुसलमानों का साथ सहयोग होता है. लेकिन मुसलमानों के साथ ही कोई नहीं होता.

डीएसपी जिया-उल-हक़ मारा गया कोई आंदोलन नहीं.
पुणे में मोहसिन शेख की हात्या कोई आंदोलन नहीं.
अखलाख मारा गया कोई आंदोलन नहीं.
एनआईए अफसर जियाउल हक़ मारा गया कोई आंदोलन नहीं.
नंबर गिनाऊ तो हजार नाम है लेकिन एक भी आंदोलन नहीं.

सूना है करीब 52 हजार बेगुनाह मुसलमान जेल में सडाये जा रहे है. लेकिन इनके लिए कोई आंदोलन नहीं, कोई चर्चा नहीं, इस विषय पर विस्तृत जानकारी एवं प्रचार प्रसार नहीं. जब किस और जाती के एक व्यक्ति का क़त्ल होता है कई आंदोलन किये जाते है जिसमे मुसलमान की दाढ़ी टोपी सबके आगे नजर आती है. लेकिन अकेले मुसलमान के क़त्ल के लिए तो कोई नहीं आता लेकिन 52 हजार बेगुनाहों का जेल में सड़ना यानी उनके परिवार के क़त्ल से कम नहीं. लाखो लोगो के क़त्ल के बावजूद कोई आंदोलन नहीं कोई संगठन नहीं. और हर वक्त मुसलमानों को साथ लेकर होते रहे आंदोलन बेगुनाह आतंकवाद के नाम पर जेल में अपनी जिंदगियां बर्बाद करते मुसलमानों के लिए सिर्फ बोलबच्चन.........!!